जा पथ कौं पथ लेत महामुनि - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी

जा पथ कौं पथ लेत महामुनि - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी

जा पथ कौं पथ लेत महामुनि,
मूंदत नैंन, गहैँ नित नाँकौ । [1]
जा पथ कौं पछितात हैं वेद,
लहैं नहिं भेद, रहैं जकि जाकौ ॥ [2]
सो पथ श्रीहरिदास लह्यौ,
रस-रीति की प्रीति चलाइ निसाँकौ । [3]
निसाननि बाजत, गाजत ‘गोविंद’!
रसिक अनन्यनि कौ पथ बाँकौ ॥ [4]

- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी

जिस पथ को पाने के लिए महामुनि नयन और नासिका को मूँदकर ध्यान करते हैं । [1]

वेद, जिसके भेद को न पाकर पछताते हैं । [2]

वही पथ श्री हरिदास जी ने प्राप्त किया है और निशंक होकर इस नित्य विहार रस रीति की प्रीति का प्रवर्तन किया है । [3]

मैं, गोविंद स्वामी डंके की चोट पर इस बात की घोषणा कर रहा हूँ कि रसिक अनन्यों का यह पथ बाँका है, विलक्षण है और अद्भुत है । [4]