जो पै जिय लज्जा नहीं, कहा कहौं सौ बार ।
एकहु अंक न हरि भजे, रे सठ ‘सूर’ गँवार ॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
सूरदास जी कहते हैं कि हे गँवार और दुष्ट मन! यदि तुझे लज्जा ही नहीं है, तो मैं तुझे सौ बार क्या कहूँ? क्योंकि तूने तो एक बार भी भगवान का भजन नहीं किया।
एकहु अंक न हरि भजे, रे सठ ‘सूर’ गँवार ॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
सूरदास जी कहते हैं कि हे गँवार और दुष्ट मन! यदि तुझे लज्जा ही नहीं है, तो मैं तुझे सौ बार क्या कहूँ? क्योंकि तूने तो एक बार भी भगवान का भजन नहीं किया।

