रहो रे मन गौर चरन लव लाई ।
जिन चरनन की चरन रेनुकहिं, सेवत श्याम सदाई ॥ [1]
जहँ जहँ चरन परत श्यामा को, तहँ तहँ सिर यदुराई ।
चरण पलोटत रज बिच लोटत, भूरि भाग्य जनु पाई ॥ [2]
छिन छिन दृगन लगावत पुनि पुनि, चरनन उर लपटाई ।
तुम ‘कृपालु’ कत रहे अभागे, इन चरनन बिसराई ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (91)
रे मन! तू भी वृषभानुनंदिनी श्री राधिका जू के उन कमल-कोमल-युगल-अरुण चरणों से प्रेम कर, जिन चरणों की चरण-धूलि का ब्रह्म-श्रीकृष्ण भी सेवन करते हैं । [1]
जहाँ-जहाँ किशोरी जी के युगल-चरण पड़ते हैं; वहाँ-वहाँ यादवेन्द्र श्रीकृष्ण अपना शीश रखते हैं। उन्हीं चरणों को दबाने एवं उन्हीं चरणों की धूलि में लोटने में अपना परम भाग्य समझते हैं । [2]
प्यारे श्यामसुन्दर उन्हीं चरणों को बार-बार अपने हृदय एवं अपने दोनों नेत्रों में लगाकर प्रेम-विभोर हो जाते हैं। ‘श्री कृपालु जी’ अपने लिए कहते हैं कि तुम इन अमूल्य किशोरी जी के चरणों को भुलाकर क्यों अभागे बने रहे। [3]
जिन चरनन की चरन रेनुकहिं, सेवत श्याम सदाई ॥ [1]
जहँ जहँ चरन परत श्यामा को, तहँ तहँ सिर यदुराई ।
चरण पलोटत रज बिच लोटत, भूरि भाग्य जनु पाई ॥ [2]
छिन छिन दृगन लगावत पुनि पुनि, चरनन उर लपटाई ।
तुम ‘कृपालु’ कत रहे अभागे, इन चरनन बिसराई ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (91)
रे मन! तू भी वृषभानुनंदिनी श्री राधिका जू के उन कमल-कोमल-युगल-अरुण चरणों से प्रेम कर, जिन चरणों की चरण-धूलि का ब्रह्म-श्रीकृष्ण भी सेवन करते हैं । [1]
जहाँ-जहाँ किशोरी जी के युगल-चरण पड़ते हैं; वहाँ-वहाँ यादवेन्द्र श्रीकृष्ण अपना शीश रखते हैं। उन्हीं चरणों को दबाने एवं उन्हीं चरणों की धूलि में लोटने में अपना परम भाग्य समझते हैं । [2]
प्यारे श्यामसुन्दर उन्हीं चरणों को बार-बार अपने हृदय एवं अपने दोनों नेत्रों में लगाकर प्रेम-विभोर हो जाते हैं। ‘श्री कृपालु जी’ अपने लिए कहते हैं कि तुम इन अमूल्य किशोरी जी के चरणों को भुलाकर क्यों अभागे बने रहे। [3]

