(सवैया)
लोक वेद मरजाद गहैं न लहै, सुख आपु कलंक कुसंग निवासी। [1]
बैठत ऑनि अनन्यन के आसन, दासन प्रेम प्रसंग उदासी॥ [2]
साहिब सेवक रीति न जानैं, क्यौं मानैं महासठ बुद्धि विनासी। [3]
ह्याँ सुद्ध अनन्य बसें वन वृन्द, खरिकु खरो खोटौ लोग लिवासी॥ [4]
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (16)
अनन्य रसिक जनों की रति को समझाते हुए श्री नागरीदेव जी कहते हैं कि यदि कोई उपासक श्री वृंदावन धाम की विशुद्ध प्रेमरस उपासना में लोक और वेद की मर्यादा का मिश्रण करता है, तो ऐसे व्यक्ति को हमारे यहाँ कलंकित और कुसंगी माना जाता है। [1]
जो प्रेम के प्रसंग से उदासीन हैं और अन्य मार्गों के अनुयायियों के आसन पर बैठते हैं, उनसे क्या लाभ हो सकता है? [2]
जो स्वामी और सेवक की शुद्ध रीति को नहीं मानते, वे महाशठ हैं और उनकी बुद्धि पूर्णतः विनष्ट हो चुकी है। [3]
वृन्दावन केवल अनन्य और विशुद्ध प्रेमधर्म का पालन करने वाले भक्तों का ही निवास स्थान है। अन्य कपटी और वेषधारी निवासी सब खोटे हैं। [4]
लोक वेद मरजाद गहैं न लहै, सुख आपु कलंक कुसंग निवासी। [1]
बैठत ऑनि अनन्यन के आसन, दासन प्रेम प्रसंग उदासी॥ [2]
साहिब सेवक रीति न जानैं, क्यौं मानैं महासठ बुद्धि विनासी। [3]
ह्याँ सुद्ध अनन्य बसें वन वृन्द, खरिकु खरो खोटौ लोग लिवासी॥ [4]
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (16)
अनन्य रसिक जनों की रति को समझाते हुए श्री नागरीदेव जी कहते हैं कि यदि कोई उपासक श्री वृंदावन धाम की विशुद्ध प्रेमरस उपासना में लोक और वेद की मर्यादा का मिश्रण करता है, तो ऐसे व्यक्ति को हमारे यहाँ कलंकित और कुसंगी माना जाता है। [1]
जो प्रेम के प्रसंग से उदासीन हैं और अन्य मार्गों के अनुयायियों के आसन पर बैठते हैं, उनसे क्या लाभ हो सकता है? [2]
जो स्वामी और सेवक की शुद्ध रीति को नहीं मानते, वे महाशठ हैं और उनकी बुद्धि पूर्णतः विनष्ट हो चुकी है। [3]
वृन्दावन केवल अनन्य और विशुद्ध प्रेमधर्म का पालन करने वाले भक्तों का ही निवास स्थान है। अन्य कपटी और वेषधारी निवासी सब खोटे हैं। [4]

