हम तो बरसाने के बासी - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (107)

हम तो बरसाने के बासी - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (107)

हम तो बरसाने के बासी ।
गहवर गिरि जहाँ खोरसांकरी, ललित ठौर सुखरासी ॥ [1]
कुण्ड भरे जल बन उपवन छबि, कुंजकुटी अनयासी ।
कुंवरिलली की देत दुहाई, सब सुख शैलनिवासी ॥ [2]
नर-नारी पशु पंछी इहिं ठां, लीला ललित उपासी ।
फ़िरत लाड़िली कै संग निति, नटनागर करत खवासी ॥ [3]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (107)

हम श्री बरसाना धाम के वासी हैं कहाँ सुंदर गह्वर वन है, ब्रह्म पर्वत है, साँकरी खोर आदि हैं, जहां की ठौर सुंदर एवं रस बरसाने वाली है । [1]

जहां के कुंडों में जल भरा रहता है, जहां के वनों, उपवनों एवं कुंज कुटीर आदि की शोभा अनायास ही निराली बनी हुई है । जहां के वासी श्री लाड़ली जू [श्री राधा] को सुखपूर्वक दुहाई देते हैं । [2]

इस बरसाना धाम के नर नारी, पशु पक्षी आदि सदा श्री राधा रानी की ललित लीला के उपासक हैं । श्री नागरीदास जी कहते हैं कि बरसाना वासी सदा श्री राधा के संग निवास करते हैं जहां श्री कृष्ण भी श्री राधा की दासता में निमग्न हैं । [3]