नारायण हरि प्रीति में, जाको तन मन चूर - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (170)

नारायण हरि प्रीति में, जाको तन मन चूर - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (170)

नारायण हरि प्रीति में, जाको तन मन चूर ।
ताहि न ममता और सों, निकट रहौ वा दूर ॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (170)

जिसके ह्रदय में श्री हरि की सच्ची प्रीति होती है उसका तन मन श्री हरि में ऐसा रमा होता है कि उसकी अन्य किसी से ममता नहीं होती चाहे कोई उसके निकट रहे या दूर, उससे उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।