(राग रामकली)
लाल की अँखियाँ रूप लुभानी ।
आठों जाम पिवत ही बीते, तऊ तृपति नहीं मानी ॥ [1]
लखि लखि नयन चयन नहिं पावैं, चाहत हियें समानी ।
अलबेली अलि रूप तरंगनी, पिय मन मीन रहानी ॥ [2]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (41)
श्री लालजी [कृष्ण] की अँखियाँ सदा श्री राधा के रूप से मोहित रहती हैं । यूँ तो उनकी अँखियाँ सदा श्री राधा रूप रस को पीती रहती हैं, फिर भी वे तृप्त नहीं होती । [1]
श्री राधा के रूप को इकटक निहारते रहने पर भी लालजी की अँखियों को चैन नहीं मिलता, वे उनको सदा के लिए ह्रदय में समा लेना चाहती हैं । श्री अलबेली अलि कहते हैं कि श्री राधा के अगाध समुद्र के समान रूप की रस तरंगों में प्रियतम श्री कृष्ण का मन मीन की तरह रहता है । [2]
लाल की अँखियाँ रूप लुभानी ।
आठों जाम पिवत ही बीते, तऊ तृपति नहीं मानी ॥ [1]
लखि लखि नयन चयन नहिं पावैं, चाहत हियें समानी ।
अलबेली अलि रूप तरंगनी, पिय मन मीन रहानी ॥ [2]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (41)
श्री लालजी [कृष्ण] की अँखियाँ सदा श्री राधा के रूप से मोहित रहती हैं । यूँ तो उनकी अँखियाँ सदा श्री राधा रूप रस को पीती रहती हैं, फिर भी वे तृप्त नहीं होती । [1]
श्री राधा के रूप को इकटक निहारते रहने पर भी लालजी की अँखियों को चैन नहीं मिलता, वे उनको सदा के लिए ह्रदय में समा लेना चाहती हैं । श्री अलबेली अलि कहते हैं कि श्री राधा के अगाध समुद्र के समान रूप की रस तरंगों में प्रियतम श्री कृष्ण का मन मीन की तरह रहता है । [2]

