बसी उर राधारमण मुसिक्यान - श्री गुणमंजरी दास

बसी उर राधारमण मुसिक्यान - श्री गुणमंजरी दास

बसी उर राधारमण मुसिक्यान ।
नहि भावे विध औ निषे कछु नहीं लोक कुल कान ॥ [1]
पूरण मुख शशि चांदनी निरखत दृग चकोर सम जान ।
कुन्दकली दशनावलि शोभा गुण मंजरी पहचान ॥ [2]

- श्री गुणमंजरी दास

मेरे ह्रदय में श्री राधा रमण की मुस्कान ऐसी बस गई है कि अब मुझे न तो विधि-निषेध का पालन पसंद आता है और न ही लोक कुल की मर्यादा आदि ही भाती है । [1]

मेरे नेत्र उनके शरद चन्द्र मुख को चकोर की भाँति निहारते रहते हैं । श्री गुण मंजरी जी कहते हैं कि श्री राधारमण के कुंदकली के समान उज्ज्वल वर्ण दंतावली की शोभा का तो कहना ही क्या । [2]