(राग मालव)
तेरे नैंननि की बलि जाउँँ ।
मोहनलाल बाल-रस भींने,
जिय भावत इह नाऊँ ॥ [1]
बलि-बलि चारु बिलोकनि ऊपर,
बलि बलि गोकुल गामु ।
बलि-बलि ‘कृष्णदास’ बलिहारी,
गुनिजन चित-विश्रामु ॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (76)
हे श्री राधिका प्यारी! तुम्हारे नयनों पर बलिहारी जाता हूँ ! मोहन लाल श्री कृष्ण इन नैनों के रस से सदा भींजें रहते हैं एवं उनके ह्रदय को तुम्हारा नाम ही भाता है । [1]
तुम्हारे चपल अनियारे नयनों की चितवन पर साक्षात गोकुल धाम भी न्यौछवार है । श्रीकृष्णदास जी कहते हैं कि मैं स्वयं भी इन नेत्रों पर बलिहारी जाता हूँ जो रसिकों के चित्त का विश्रामस्थल है । [2]
तेरे नैंननि की बलि जाउँँ ।
मोहनलाल बाल-रस भींने,
जिय भावत इह नाऊँ ॥ [1]
बलि-बलि चारु बिलोकनि ऊपर,
बलि बलि गोकुल गामु ।
बलि-बलि ‘कृष्णदास’ बलिहारी,
गुनिजन चित-विश्रामु ॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (76)
हे श्री राधिका प्यारी! तुम्हारे नयनों पर बलिहारी जाता हूँ ! मोहन लाल श्री कृष्ण इन नैनों के रस से सदा भींजें रहते हैं एवं उनके ह्रदय को तुम्हारा नाम ही भाता है । [1]
तुम्हारे चपल अनियारे नयनों की चितवन पर साक्षात गोकुल धाम भी न्यौछवार है । श्रीकृष्णदास जी कहते हैं कि मैं स्वयं भी इन नेत्रों पर बलिहारी जाता हूँ जो रसिकों के चित्त का विश्रामस्थल है । [2]

