एतामुपासते सर्वे तृणगुल्मलतादयः ।
पलाशार्क करीलाद्या राधे राधे रटन्ति ताम् ।
क्षुद्राश्चराचरा जीवाः सखे किमुत मानवाः ॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (6.67)
वृन्दावन के तृण, गुल्म और लता आदि सभी इनकी (श्रीराधारानी की) उपासना करते हैं। सखे! श्रीवृन्दावन में क्षुद्र चराचर जीव तथा आक, ढाक और करील आदि भी “राधे! राधे!” कहकर उनकी रट लगाये रहते हैं, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या।
पलाशार्क करीलाद्या राधे राधे रटन्ति ताम् ।
क्षुद्राश्चराचरा जीवाः सखे किमुत मानवाः ॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (6.67)
वृन्दावन के तृण, गुल्म और लता आदि सभी इनकी (श्रीराधारानी की) उपासना करते हैं। सखे! श्रीवृन्दावन में क्षुद्र चराचर जीव तथा आक, ढाक और करील आदि भी “राधे! राधे!” कहकर उनकी रट लगाये रहते हैं, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या।

