भगवत जन स्वाधीन नहिं, पराधीन जिमि चंग ।
गुन दीने आकास में, गुन लीने अंग संग ॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (23)
भले ही मनुष्य को लगे कि वह स्वतंत्र है परंतु वह कभी भी स्वतंत्र नहीं है, वह हर स्थिति में भगवान के सदा आधीन ही रहता है । जिस प्रकार डोर का विस्तार करने से पतंग आकाश में तो स्वतंत्र उड़ती दिखती है, परंतु उड़ाने वाले के समेटते ही, हाथ में आ जाती है । (इसका एक यह भी भाव है कि जैसे जैसे जीव अपने गुणों का बखान करता है वह श्री हरि से दूर होता रहता है, और जैसे ही वह अहंकार शून्य हो जाता है वह श्री हरि के एक दम पास पहुँच जाता है ) ।
गुन दीने आकास में, गुन लीने अंग संग ॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (23)
भले ही मनुष्य को लगे कि वह स्वतंत्र है परंतु वह कभी भी स्वतंत्र नहीं है, वह हर स्थिति में भगवान के सदा आधीन ही रहता है । जिस प्रकार डोर का विस्तार करने से पतंग आकाश में तो स्वतंत्र उड़ती दिखती है, परंतु उड़ाने वाले के समेटते ही, हाथ में आ जाती है । (इसका एक यह भी भाव है कि जैसे जैसे जीव अपने गुणों का बखान करता है वह श्री हरि से दूर होता रहता है, और जैसे ही वह अहंकार शून्य हो जाता है वह श्री हरि के एक दम पास पहुँच जाता है ) ।

![भगवत जन स्वाधीन नहिं - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (23)](https://images.brajrasik.org/654f91276ba623000868f603-m.jpeg)