प्रीति की रीत ही अति न्यारी ।
लोक बेद सब सों कछु उलटो, केवल प्रेमिन प्यारी ॥ [1]
को जानै समुझै को याको, बिरली जाननहारी ।
‘हरीचंद' अनुभव ही लखिये, जामें गिरवरधारी ॥ [2]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (59)
प्रीति की रीति तो अति ही न्यारी है । यह प्रीति (प्रेम) का मार्ग लोक, वेद एवं अन्य सभी मार्ग से थोड़ा उलटा है जिसे केवल प्रेमी ही पसंद करते हैं । [1]
इस संपूर्ण संसार में इसको समझने एवं जानने वाले गिने चुने कुछ विरले जन ही होंगे । श्री हरिश्चंद्र जी कहते हैं कि केवल प्रेमी ही एक प्रेमी को अपने अनुभव से जान सकता है जिसपर चलना श्री कृष्ण कृपा से ही संभव है । [2]
लोक बेद सब सों कछु उलटो, केवल प्रेमिन प्यारी ॥ [1]
को जानै समुझै को याको, बिरली जाननहारी ।
‘हरीचंद' अनुभव ही लखिये, जामें गिरवरधारी ॥ [2]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (59)
प्रीति की रीति तो अति ही न्यारी है । यह प्रीति (प्रेम) का मार्ग लोक, वेद एवं अन्य सभी मार्ग से थोड़ा उलटा है जिसे केवल प्रेमी ही पसंद करते हैं । [1]
इस संपूर्ण संसार में इसको समझने एवं जानने वाले गिने चुने कुछ विरले जन ही होंगे । श्री हरिश्चंद्र जी कहते हैं कि केवल प्रेमी ही एक प्रेमी को अपने अनुभव से जान सकता है जिसपर चलना श्री कृष्ण कृपा से ही संभव है । [2]

