वा रस की कछु माधुरी, ऊधो लही सराहि ।
पावै बहुरि मिठास अस, अब दूजो को आहि ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (39)
प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेमानंद का कुछ माधुर्य उद्भव ने सराहकर ग्रहण किया था । जो प्रेम रस उद्भव को ब्रज में प्राप्त हुआ था उसको अब फिर से कौन प्राप्त कर सकता है ?
पावै बहुरि मिठास अस, अब दूजो को आहि ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (39)
प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेमानंद का कुछ माधुर्य उद्भव ने सराहकर ग्रहण किया था । जो प्रेम रस उद्भव को ब्रज में प्राप्त हुआ था उसको अब फिर से कौन प्राप्त कर सकता है ?

