(कवित्त)
कोटि कोटि नरकादिक तिनहूँ सौं निंद ऐसी
विषय वार्ता ताकौं भूल विसरायौ है। [1]
मुक्ति आदि मार्ग बहु वेद श्रुति गाये सोउ
मोकौं न भाये या तें हियरा डरायौ है॥ [2]
परब्रह्म ध्यान रति रहत शुकादि नित
कहूँ साँच-साँच सोऊ चित नाहिं आयौ है। [3]
मैं तो श्रीराधा पद कंज दुःखगंजन रस
रज की मन रंजन मन मंजन करायौ है॥ [4]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (83)
विषय तो दूर विषय की चर्चा भी मत करो क्योंकि वह करोड़ों नरकों से भी घृणित है। [1]
मुक्ति आदि जो अनेक मार्ग वेदों एवं शास्त्रों ने गाए हैं उससे तो मुझे भय लगता है। [2]
परम पुरुष भगवान् के भजन में यदि शुकदेव आदि उन्मत्त हैं तो उनसे हमें क्या? [3]
हमारा मन तो ‘श्रीराधारानी के चरण-रस' में ही डूबा रहे (यही अभिलाषा है)। [4]
कोटि कोटि नरकादिक तिनहूँ सौं निंद ऐसी
विषय वार्ता ताकौं भूल विसरायौ है। [1]
मुक्ति आदि मार्ग बहु वेद श्रुति गाये सोउ
मोकौं न भाये या तें हियरा डरायौ है॥ [2]
परब्रह्म ध्यान रति रहत शुकादि नित
कहूँ साँच-साँच सोऊ चित नाहिं आयौ है। [3]
मैं तो श्रीराधा पद कंज दुःखगंजन रस
रज की मन रंजन मन मंजन करायौ है॥ [4]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (83)
विषय तो दूर विषय की चर्चा भी मत करो क्योंकि वह करोड़ों नरकों से भी घृणित है। [1]
मुक्ति आदि जो अनेक मार्ग वेदों एवं शास्त्रों ने गाए हैं उससे तो मुझे भय लगता है। [2]
परम पुरुष भगवान् के भजन में यदि शुकदेव आदि उन्मत्त हैं तो उनसे हमें क्या? [3]
हमारा मन तो ‘श्रीराधारानी के चरण-रस' में ही डूबा रहे (यही अभिलाषा है)। [4]

