पिय-संग झूली री सरस हिंडोरैं - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (112)

पिय-संग झूली री सरस हिंडोरैं - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (112)

(राग विहाग)
पिय-संग झूली री ! सरस हिंडोरैं।
ब्रज-जुबती चहुं दिसि तें सजि सजनी ! झुलवति थोरैं-थोरैं ॥ [1]
नीलांबर पीताम्बर राजत घन-दामिनि चित चोरैं ।
कुंभनदास प्रभु गिरिधर देखत छबि की उठत झकोरैं ॥ [2]

- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (112)

श्री राधा के संग प्रियतम श्री कृष्ण सुंदर हिंडोरे में झूल रहे हैं जिनके चारों दिशाओं में ब्रज की युवतियाँ सजी हुई हैं और वे धीरे धीरे झूला झुला रही हैं । [1]

श्री राधा ने नीलांबर एवं श्री कृष्ण ने पीतांबर धारण किया जिनकी उपमा घन और दामिनी के समान है, जो चित्त का हरण करने वाली है । श्री कुंभनदास जी कहते हैं कि गिरिधर लाल को निहारकर ऐसा लगता है मानो छवि की लहरें चल रही हों । [2]