आसा जाकी जहँ बसी तहँ ताही कौ बास - श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (24)

आसा जाकी जहँ बसी तहँ ताही कौ बास - श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (24)

आसा जाकी जहँ बसी, तहँ ताही कौ बास ।
गेही होय विरक्‍त कै, कै स्वामी कै दास ॥ [1]
कै स्वामी कै दास, महातम सब कहिबे कौं ।
भगवत रसिक अनन्य बचन जुग जुग गहिबे कौं ॥ [2]
तजै निवृतित्त प्रवृत्ति, रहैं नित तिनके पासा ।
नित्य बिहार अखंड, मिलन की जिनकों आसा ॥ [3]

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (24)

गुहस्थ हो या विरक्त, स्वामी हो या सेवक, जिसका मन जहां आसक्त है बस वो उसके ही पास रहता है । [1]

यदि कोई सांसारिक विषय में आसक्त है तो उस (संत, महात्मा, सेवक, विरक्त, ग्रहस्त आदि कोई हो) की माहात्म की गाथाएँ केवल कहने भर की ही हैं, परंतु रहेगा तो वह विषयी ही  । श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि अनन्य रसिकों के वचनों को बहुत ही सूक्ष्मता से समझना चाहिए और युगों युगों तक गाँठ बांध कर रखना चाहिए । [2]

जिनको वृंदावन रस के अखंड नित्य विहार रस की चाह हो, उनको तो निवृति एवं प्रवृति आदि सब मार्गों को त्याग कर, केवल प्रेम मार्गी रसिक संतों के संग ही सदा निवास करना चाहिए । [3]