दूलह लाल दुलहिनी राधा - श्री हित कृष्णदास जी

दूलह लाल दुलहिनी राधा - श्री हित कृष्णदास जी

दूलह लाल दुलहिनी राधा ।
और नाम कवि वृथा ही धरत हैं, कहाँ यह छबि कहाँ प्रीति अगाधा ॥ [1]
रूप-रासि रस-रासि रसिक दोऊ, निरखत नैंन पूजत सब साधा ।
दै बीरी ‘जै कृष्ण सखी हित’, निकट न बिछुरत हैं पल आधा ॥ [2]

- श्री हित कृष्णदास जी

श्री लालजी [कृष्ण] दूल्हा हैं और श्री राधा दुल्हन । इन प्रिया लाल के अतिरिक्त अन्य किसी जोड़ी का नाम कवि वृथा ही लेते हैं क्योंकि न तो किसी जोड़ी में कहीं ऐसी अद्भुत छवि है और न ही इस प्रकार की अगाध प्रीति । [1]

यह सुंदर रसिक जोड़ी रूप एवं रस की राशि है जिनको निहार कर समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं । श्री हित कृष्ण दास अलि स्वरूप से कहती हैं कि वे प्रिया लाल को पान की बीड़ी प्रदान करती हैं एवं उनसे आधे क्षण को भी नहीं बिछड़ती । [2]