अवकै तो करुणा कियैं बनैं वलि -  श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (71)

अवकै तो करुणा कियैं बनैं वलि - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (71)

(राग झँझोटी)
अवकै तो करुणा कियैं बनैं वलि ।
भव-सागर विकराल विपुल ताकी,
भवर - जाल तैं जाऊं कहां टलि ॥ [1]
औगुन खांनि जांनि आंनांकानी जू,
जो उर आंनी तौ नहि कहूं थलि ।
हो मतिहीनि मलीनि करम की जू,
तुमतैं विछुरि गई रज में रलि ॥ [2]
कलपांतर कहूं जाय परोंगी जू,
तो कब ऐहूं तुव पद ढिग ढलि ।
वही आज्ञा उर मैं सुधि करिये जू,
तू मेरी है रूपरसिक अलि ॥ [3]

- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (71)

हे स्वामिनी जू (श्री राधे)! अबकी बार तो आपकी कृपा मुझपर होनी बनती है। यह भवसागर अत्यंत विकराल एवं विपुल है, मैं तुम्हारी कृपा के बिना इस भँवर जाल रूपी सांसारिक द्वन्दों से कैसे पार उतर सकता हूँ ? [1]

हे राधे! मुझे अवगुणों की खान जान कर क्यों आनाकानी (मेरी विनती को अनसुनी) कर रही हो? यदि तुम मेरे कल्याण के विषय में नहीं सोचोगी तो अन्य आपके अतिरिक्त किसी अन्य द्वार पर मेरा कल्याण होना असंभव है । मैं तो मतिहीन एवं मलीन कर्म वाला हूँ, और जब से तुमसे बिछड़ा हूँ तब से मिट्टी में मिल (दुर्गति को प्राप्त) रहा हूँ । [2]

करोड़ों कल्पों में सांसारिक द्वन्दों का दुख भोग कर, अब जाकर मुझे कहीं तुम्हारे चरणों का आश्रय प्राप्त हुआ है । श्री रूप रसिक देवाचार्य कहते हैं कि हे स्वामिनी! तुमने जो मुझे आज्ञा देकर कहा था कि “तू मेरी रूपरसिक अलि है”, उसी का आप चिंतन कर मुझ पर कृपा कीजिए । [3]