वह रस सिंधु अगाध है, मो मति अति लघु मीन ।
रसिक अनन्यन मुख सुन्यों, सोई यह लिख लीन ॥
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, महल वर्णन (11)
श्री प्रिया प्रियतम के महल का रस अगाध सिंधु के समान है, और मेरी बुद्धि उस समुद्र की एक छोटी मछली के समान है । जो मैंने अनन्य रसिकों के मुख से सुना है, वही लिख दिया है ।
रसिक अनन्यन मुख सुन्यों, सोई यह लिख लीन ॥
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, महल वर्णन (11)
श्री प्रिया प्रियतम के महल का रस अगाध सिंधु के समान है, और मेरी बुद्धि उस समुद्र की एक छोटी मछली के समान है । जो मैंने अनन्य रसिकों के मुख से सुना है, वही लिख दिया है ।

