निस दिन आस बन बास की लगी ही रहै - श्री किशोरी अलि

निस दिन आस बन बास की लगी ही रहै - श्री किशोरी अलि

(कवित्त)
निस-दिन आस बन-बास की लगी ही रहै,
याही को उपाय जन करत बिचारौ है। [1]
एकहू छिन कहूँ थिरता न लहत मन,
बृथा वय जात तातें होत भय भारौ है॥ [2]
भाँति भाँति तापन तैं ब्याकुल ही दीसैं सब,
ऐसौ ही समय आयौ तासों कहा सारौ है। [3]
इहि कलि-काल की कुचाल सौं डरे कौ अब,
कुँवरि ‘किसोरी’ एक आसरौ तिहारौ है॥ [4]

- श्री किशोरी अलि

श्री वृंदावन वास की ही आशा निश दिन लगी रहे, बस एक यही उपाय विचारना चाहिए। [1]

एक क्षण भी मन को चैन नहीं, यह जीवन की आयु व्यर्थ ही नष्ट हो रही है और मन में भयानक भय बना हुआ है। [2]

ऐसा घोर कलयुग का समय चल रहा है कि सब लोग विभिन्न प्रकार के तापों (दैहिक, दैविक, एवं भौतिक) से जलते हुए दिख रहे हैं। [3]

श्री किशोरी अलि जी कहते हैं कि इस कलयुग की कुचाल से मेरा ह्रदय डर रहा है, हे कुँवरी किशोरी, अब तो बस केवल आपका ही आसरा है! [4]