नरक परन आछो लगे, कुंवरि चरन के हेत।
इन चरनन बिन ना चहों, नेक निकुंज निकेत॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (26)
यदि श्री राधा के चरणों का संग प्राप्त हो, तो नरक का वास भी मुझे प्रिय होगा। परंतु उनके चरणों के बिना, चाहे मुझे सुंदर निकुंज का वास ही क्यों न मिल जाए, ऐसा निकुंज मुझे एक क्षण के लिए भी स्वीकार नहीं।
इन चरनन बिन ना चहों, नेक निकुंज निकेत॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (26)
यदि श्री राधा के चरणों का संग प्राप्त हो, तो नरक का वास भी मुझे प्रिय होगा। परंतु उनके चरणों के बिना, चाहे मुझे सुंदर निकुंज का वास ही क्यों न मिल जाए, ऐसा निकुंज मुझे एक क्षण के लिए भी स्वीकार नहीं।

