अहो नाथ ब्रजनाथ जू कित त्यागौ निज दास - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (10)

अहो नाथ ब्रजनाथ जू कित त्यागौ निज दास - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (10)

अहो नाथ ब्रजनाथ जू, कित त्यागौ निज दास ।
वेगहि दरसन दीजिये, व्यर्थ जात सब साँस ॥

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (10)

हे ब्रज नाथ, मेरे प्राणनाथ श्री कृष्ण! आपने अपने इस निज दास को क्यों त्याग दिया । कृपा कर जल्द ही मुझे अपने दर्शन से कृतार्थ करो क्योंकि तुम्हारे मिले बिना मेरा जीवन व्यर्थ है ।