मैं तो सांवरे के रंग रांची - श्री मीराबाई

मैं तो सांवरे के रंग रांची - श्री मीराबाई

मैं तो सांवरे के रंग रांची ।
साजि सिंगार बांधि पग घुंघरू, लोक-लाज तजि नाची ॥ [1]
गई कुमति लई साधुकी संगति, भगत रूप भइ सांची ।
गाय गाय हरि के गुण निस दिन, कालब्यालसूं बांची ॥ [2]
उण बिन सब जग खारो लागत, और बात सब कांची ।
मीरा श्रीगिरधरन लालसूं, भगति रसीली जांची ॥ [3]

- श्री मीराबाई

मीराबाई जी कहती हैं कि मैं तो साँवले स्वरूप वाले श्री कृष्ण के श्याम रंग में रँग गयी हूँ। अब मैंने लोक-लाज की मर्यादाओं का त्याग कर दिया है, और श्री कृष्ण को रिझाने के लिए ही अपना संपूर्ण श्रृंगार कर, पैरों में घुँघरू बाँधकर, नाच रही हूँ । [1]

साधुओं की संगति से मेरी समस्त कुमति मिट गयी है और मैं श्रीकृष्ण की सच्ची भक्ति में लीन हो गई हूँ । मैं प्रभु श्रीकृष्ण का नित्य गुणगान करके कालरूपी सर्प के चंगुल से बच गयी हूँ अर्थात् अब मैं जन्म-मरण के चक्र से छूट गयी हूँ । [2]

अब श्री कृष्ण के बिना मुझे यह समस्त संसार फीका लगता है, अतः उनके गुणगान के अतिरक्त समस्त सांसारिक बातें व्यर्थ लगती हैं। मीराबाई जी कहती हैं कि अब तो मुझे गिरिधर लाल श्री कृष्ण की रसीली भक्ति में ही केवल आनंद मिलता है । [3]