प्यारी तेरी चाल चितवन बाँकी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (6)

प्यारी तेरी चाल चितवन बाँकी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (6)

(राग विभास)
प्यारी तेरी चाल चितवन बाँकी ।
बाँके बसन, आभरन बाँके,
बंक रेख उर आँकी ॥ [1]
बंक सुभाव, मिलन बाँकी, प्रिया
बंक कोर रहि झाँकी ।
श्रीबीठलविपुल बिहारी बाँके मिले,
तातें तू फिरत निसाँकी ॥ [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (6)

सहचरी भावापन्न श्री विट्ठल विपुल देव जी श्री राधा रानी से कहते हैं: हे प्यारी! आज आपकी चालचलन एवं चितवन में विशेष रस बंकता उदभासित हो रही है । आपके श्रीअंग पर विलक्षण वसन एवं आभूषण सुसज्जित हो रहे हैं । रस वैभव जनित विलक्षण रेखा आपके वक्षस्थल पर दृश्यमान हो रही है । [1]

आपका स्वभाव भी अति निराला है एवं प्रियतम के संग आपका मिलन भी बाँका प्रतीत हो रहा है । आपकी तिरछी तिरछी चितवन की झांकी तो अति ही बाँकी है । श्री विट्ठल विपुल देव जी कहते हैं कि बाँके बिहारी से मिलन के कारण ही आप स्वच्छंद रस विहार में मगन होकर, निशंकता से विचरण कर रही हो । [2]