चलि सुंदरि बोली वृंदावन - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (44)

चलि सुंदरि बोली वृंदावन - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (44)

(राग सारंग)
चलि सुंदरि बोली वृंदावन ।
कामिनि कंठ लागि किन राजहि, तूँ दामिनि मोंहन नौतन घन ​​॥ [1]
कंचुकी सुरंग विविध रँग सारी, नख जुग ऊन बने तरे तन ।
ये सब उचित नवल मोहन कौं,  श्रीफल कुच जोवन आगम धन ॥ [2]
अतिसै प्रीति हुती अंतरगत,  (जैश्री) हित हरिवंश चली मुकुलित मन ।
निविड़ निकुंज मिले रस सागर, जीते सत रति राज सुरत रन ॥ [3]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (44)

(दूतिका ने श्रीप्रियाजी से कहा- ) हे सुन्दरि ! चलो !! तुम्हें ( प्रियतम ने ) वृंदावन में बुलाया है । हे कामिनि ! तुम तो हो दामिनि जैसी और मोहन नूतन घन की भाँति । तब फिर तुम उनके कण्ठ में ( घन में दामिनि की भाँति ) लग कर क्यों नहीं शोभित होती ? [1]

हे प्यारी ! तुम्हारे तन पर जो यह सुरंग कञ्चकि , विविध रंगमयी साड़ी और सोलह श्रृंगार शोभित है तथा श्रीफल जैसे कुच मण्डल नवीन यौवन रूप धन , यह सभी कुछ नवल मोहन के ही लिये तो उचित है !  [2]

श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि ( श्रीप्रियाजी के ) हृदय में ( श्रीलालजी के लिये ) अत्यन्त प्रीति थी इसलिये प्रसन्न मन होकर ( प्रियतम के निकट ) चल पड़ी और दोनों रस सागर , सघन निकुअ भवन में मिले पश्चात् उन्होंने सुरत युद्ध में शत शत काम देवों को जीत लिया । [3]