श्री राधेजू सुंदर छता हमारौ - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (89)

श्री राधेजू सुंदर छता हमारौ - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (89)

(दोहा)
बसन भीजिहैं भामिनी, छिनकि निवारौ मेह ।
मोहि सहित लायक तुमहिं, छता हमारौ एह ॥


(पद) [इकताल, राग मल्हार]
श्री राधेजू सुंदर छता हमारौ ।
मोहि सहित श्री स्यामा लायक, बन्यौ जु बनिक विचारौ ॥ [1]
भीजैंगे जु बसन-तन भामिनी, छिन इक मेह निवारौ ।
श्रीभट हठ न कियो हित जान्यौ, आनि गह्मौ हिय प्यारौ ॥ [2]

- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (89)

अबकी बार वर्षा से बचाव के लिए श्री लालजी [कृष्ण] अपने साथ जरी के बेलबूटों से मंडित तथा मोतियों की झालर से सुशोभित छत्र अपने साथ ले आये थे । श्री लाल जी कहते हैं -

(दोहा)
हे भामिनी श्रीराधे! वर्षा की इन मंद-मंद फुहारों से आपके वस्त्र भीग रहे हैं; अतः कृपा कर क्षण-भर के लिए मेरे इस छत्र की छाया में आकर वर्षा से अपनी रक्षा कर लीजिए।

(पद)
हे श्री राधे जू! हमारी यह छता अति शोभायमान है । इसकी बनावट भी बड़ी है, और हम दोनों के लिए ही मानो बनी है। [1]

हे भामिनी, आपके वस्त्र एवं तन भींज जाएँगे, अत: क्षण भर के लिए इस छत्र के नीचे आकर मेह का निवारण कर लीजिए । श्री भट्ट देवाचार्य जी कहते हैं कि श्री श्यामसुन्दर के इस प्रकार का आग्रह करने पर, अपने प्रति अगाध प्रेम जानकर, किसी भी प्रकार का हठ न कर, वे अपने प्रियतम श्री लालजी से जा मिलीं । [2]