कौन सके गुन गाय तिहारे - श्री माधुरी दास

कौन सके गुन गाय तिहारे - श्री माधुरी दास

(सवैया)
कौन सके गुन गाय तिहारे,  कुंज विहारनि लाल विहारी।
रूप विलास सनेह की सींव,  पगे रस रंग सु केलि महारी॥ [1]
माँगत हौं कर जोरि निहोरि जू,  ‘माधुरी’ और न जाचन हारी।
श्री वनवास वसै रस रास उर,  नैनन में छबि नित्त तिहारी॥ [2]

- श्री माधुरी दास

हे श्री कुंजबिहारी और श्री कुंजबिहारिनी जू! ऐसा कौन है जो आपके अगाध गुणों का गान करने में समर्थ हो? आप दोनों तो रूप, विलास और प्रेम की सीमा हैं, जो सदा केली-क्रीड़ा के अद्भुत रस और रंग में लीन रहते हैं। [1]

श्री माधुरी दास जी कहते हैं कि मैं दोनों हाथ जोड़कर आपसे कुछ और नहीं, केवल आपकी कृपा की याचना करता हूँ। आपकी कृपा से मेरा श्री वृंदावन धाम में वास बना रहे, मेरे हृदय में रास-रस उमड़ता रहे, और मेरी आँखों में नित्य आपकी मनमोहक छवि सजीव बनी रहे। [2]