(राग विहाग)
सखि! सुन सुधि आवत वा ब्रज की ।
जहां निकट हरिदासवर्य के, रही तलहटी रज की ॥ [1]
रहसि बिहार नित्य नूतन रस, केली कला मदगज की ।
‘द्वारकेश’ हों रहों निकट यह, अरज सुनो निर्लज की ॥ [2]
- श्री द्वारकेश जी
हे सखी, सुन! मुझे ब्रज की सुधि (याद) आ रही है जहां गोवर्धन में स्थित तलहटी की दिव्य रज विद्यमान है जिसके निकट हरि के सर्वश्रेष्ठ दास, सदा निवास करते हैं । [1]
वहाँ केली कला में निपुण, श्री राधा कृष्ण, जिनकी चाल मस्त हाथी के समान है, नित्य नवीन विहार रस बरसाते हैं । श्री द्वारकेश जी कहते हैं, हे लाड़ली लाल! मुझ निर्लज की अर्ज़ी सुनकर, मुझे भी तलहटी के निकट कहीं वास प्रदान करो । [2]
सखि! सुन सुधि आवत वा ब्रज की ।
जहां निकट हरिदासवर्य के, रही तलहटी रज की ॥ [1]
रहसि बिहार नित्य नूतन रस, केली कला मदगज की ।
‘द्वारकेश’ हों रहों निकट यह, अरज सुनो निर्लज की ॥ [2]
- श्री द्वारकेश जी
हे सखी, सुन! मुझे ब्रज की सुधि (याद) आ रही है जहां गोवर्धन में स्थित तलहटी की दिव्य रज विद्यमान है जिसके निकट हरि के सर्वश्रेष्ठ दास, सदा निवास करते हैं । [1]
वहाँ केली कला में निपुण, श्री राधा कृष्ण, जिनकी चाल मस्त हाथी के समान है, नित्य नवीन विहार रस बरसाते हैं । श्री द्वारकेश जी कहते हैं, हे लाड़ली लाल! मुझ निर्लज की अर्ज़ी सुनकर, मुझे भी तलहटी के निकट कहीं वास प्रदान करो । [2]

