हे अलि री लखि आजु कौ खेल - ब्रज के सवैया

हे अलि री लखि आजु कौ खेल - ब्रज के सवैया

(सवैया)
हे अलि री लखि आजु कौ खेल, बखान कहाँ लों करे मति मोरी। [1]
राधे के शीश पै मोरपखा, मुरली लकुटी कटि में पट डोरी॥ [2]
वैनी विराजत लाल के भाल, ओ चूनर रंग कसूम में बोरी। [3]
मान ह्वै मोहन बैठि रहे, सो मनावत श्रीवृषभानु किशोरी॥ [4]

- ब्रज के सवैया

अरे सखी, आज की अद्भुत लीला को निहार! मेरी बुद्धि इस अनुपम दृश्य का कहाँ तक बखान कर पाएगी? [1]

आज श्री राधा जू के सिर पर मोरपंख सजाया गया है, हाथ में मुरली और लकुटी शोभायमान हैं, और कमर में पट्टा बँधा है। [2]

श्री लालजी ने अपनी सुंदर चोटी बनाई है और माथे पर कुसुमी रंग की सुंदर चुनरी ओढ़ रखी है। [3]

आज श्री लालजी मान करके बैठे हैं, और श्री वृषभानु किशोरी अपने मधुर प्रयासों से उन्हें मनाने में लगी हुई हैं। [4]