राधे ते चरणौ विहाय शरणं  - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (7.69)

राधे ते चरणौ विहाय शरणं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (7.69)

राधे ते चरणौ विहाय शरणं नाहं लभे कुत्रचिद्
विश्वासः सुदृढो ममास्ति भवती सेवैकयोग्या भुवि ।
अक्रूरं प्रियसङ्गसंविघटकं नादूषयज्जातुचित्
दृष्टा देवि दया तवैव विमला दोषा न ते दृक्पथे ॥

- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (7.69)

हे श्रीराधे ! तुम्हारे श्रीचरणोंको छोडकर मुझे कहीं भी शरण नहीं मिली । मेरा तो सुदृढ़ विश्वास है कि इस भूमण्डल में एकमात्र आप ही सेवा करने योग्य हैं । अक्रूर ने आपका प्रियतम से वियोग करा दिया, तो भी आपने उनकी कभी निन्दा नहीं की। हे देवि ! विशुद्ध दया तो केवल आपमें ही देखनेको मिलती है ; क्योंकि आपके दृष्टि-पथ में किसी के दोष आते ही नहीं ।