मत्त भये तन-मन न सँभार ।
उपजत अति आनंद दुहूं दिसि, ए उनकौ वे इनकौ हार ॥ [1]
बारौं कोटि अनंग मदन दल, डारौं तुव लगि सब सुख वार ।
श्रीललितमोहिनी के घर आनंद, यह सुख-सार बिहार निहार ॥ [2]
- श्री ललित मोहिनी देव, ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (60)
दिव्य युगल (श्री राधा कृष्ण) नित्यविहार में ऐसे उन्मत्त हो रहे हैं कि उन्हें तन-मन की कोई सुध-बुध ही नहीं रहा है । दोनों ओर अपार आनंद उमड़ रहा है और दोनों एक दूसरे के कंठहार बने हुए हैं । [1]
श्री श्रीललित मोहिनी जी कहती हैं कि अपने घर (निकुंज भवन) में सुख के सार स्वरूप इस नित्यविहार के आनन्द को देखकर मैं कोटि कोटि कामदेवों के समूह को न्यौछवार करती हूँ एवं समस्त लौकिक एवं अलौकिक सुखों को वारती हूँ । [2]
उपजत अति आनंद दुहूं दिसि, ए उनकौ वे इनकौ हार ॥ [1]
बारौं कोटि अनंग मदन दल, डारौं तुव लगि सब सुख वार ।
श्रीललितमोहिनी के घर आनंद, यह सुख-सार बिहार निहार ॥ [2]
- श्री ललित मोहिनी देव, ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (60)
दिव्य युगल (श्री राधा कृष्ण) नित्यविहार में ऐसे उन्मत्त हो रहे हैं कि उन्हें तन-मन की कोई सुध-बुध ही नहीं रहा है । दोनों ओर अपार आनंद उमड़ रहा है और दोनों एक दूसरे के कंठहार बने हुए हैं । [1]
श्री श्रीललित मोहिनी जी कहती हैं कि अपने घर (निकुंज भवन) में सुख के सार स्वरूप इस नित्यविहार के आनन्द को देखकर मैं कोटि कोटि कामदेवों के समूह को न्यौछवार करती हूँ एवं समस्त लौकिक एवं अलौकिक सुखों को वारती हूँ । [2]

