सो सुख वृन्दाविपिन है, मूल आदिद्रुम जैस ।
ललितादिक निरखैं चतुर, जुगल नवल सम वैस ॥
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (6)
संसार में जो भी सुख दिखाई पड़ता है उसका मूल स्रोत श्री वृंदावन ही है । श्री चतुरदास जी कहते हैं कि उसे लालितादिक सहचरियाँ नित नव कैशोर-मंडित श्री श्याम कुंजबिहारी के रूप में देखती हैं ।
ललितादिक निरखैं चतुर, जुगल नवल सम वैस ॥
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (6)
संसार में जो भी सुख दिखाई पड़ता है उसका मूल स्रोत श्री वृंदावन ही है । श्री चतुरदास जी कहते हैं कि उसे लालितादिक सहचरियाँ नित नव कैशोर-मंडित श्री श्याम कुंजबिहारी के रूप में देखती हैं ।

