धन धन वृंदावन के विरक्त सन्त ।
प्रात होय जमुना में न्हावैं, आछे रज सेवंत ॥ [1]
ब्रज वासिन के टुकड़ा पावैं, भोजन करैं एकन्त ।
अभयराम ऐ तो बड़भागी, ये सन्तन के सन्त ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (82)
श्री वृंदावन धाम के विरक्त संत धन्य धन्य हैं । सुबह होते ही यह संत श्री यमुना जी में नहाते हैं एवं यहाँ की परम पावन रज का सेवन करते हैं (एवं अपने अंगों पर धारण करते हैं ) । [1]
ब्रज वासियों द्वारा टुकड़े पाते हैं एवं एकांत में भोजन करते हैं । श्री अभयराम जी कहते हैं कि यह अत्यंत भागश्याली हैं, एवं समस्त संतों के भी यह संत हैं । [2]
प्रात होय जमुना में न्हावैं, आछे रज सेवंत ॥ [1]
ब्रज वासिन के टुकड़ा पावैं, भोजन करैं एकन्त ।
अभयराम ऐ तो बड़भागी, ये सन्तन के सन्त ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (82)
श्री वृंदावन धाम के विरक्त संत धन्य धन्य हैं । सुबह होते ही यह संत श्री यमुना जी में नहाते हैं एवं यहाँ की परम पावन रज का सेवन करते हैं (एवं अपने अंगों पर धारण करते हैं ) । [1]
ब्रज वासियों द्वारा टुकड़े पाते हैं एवं एकांत में भोजन करते हैं । श्री अभयराम जी कहते हैं कि यह अत्यंत भागश्याली हैं, एवं समस्त संतों के भी यह संत हैं । [2]

