मो सौ नहिं कोऊ पातकी तुमसौ अधम उधारि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)

मो सौ नहिं कोऊ पातकी तुमसौ अधम उधारि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)

मो सौ नहिं कोऊ पातकी, तुमसौ अधम उधारि ।
तुम हौ तैसी कीजियौ, अहो रसिक सकुँवारि ॥ [1]
अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि ।
बंध्यौ रहै मन रैन दिना, तुव प्रेम के डोरि ॥ [2]
जो चाहौ सो करौ कुँवरि, त्रिविध तम हरना ।
अलबेलीअलि परी आनि, पद-पंकज-सरना ॥ [3]

- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)

मेरे समान कोई पातकी नहीं और आपके समान कोई अधम उधार नहीं । हे रसिक क़ुंवरि श्री राधिके, कृपया आप वही कीजिए जिसके लिए आप ‘अधम उधारन’ जानी जाती हैं [अर्थात् मुझ जैसे पतित का कल्याण कीजिए जो आपकी शरण में आया है ] । [1]

हे रसिक सकुँवारी लाड़ली श्री राधिके! मैं दोनों हाथों को जोड़ कर यहीं विनती करती हूँ कि मेरा मन दिन रात, हर क्षण तुम्हारे प्रेम की डोरी से बंधा रहे । [2]

हे श्री राधे, आप ही हैं जो त्रिविध तम [अर्थात् सत्व, रज और तम गुण] का हरण करने वाली हैं । श्री अलबेली अलि आपके चरण कमल की शरण में आ चुकी है, अब आपको जैसा भावे वैसा ही करिए । [3]