अखिल जनन बीथी भुक्त नाना प्रयासै:
कथमपि मनुजत्वं प्राप्तमप्राप्य मेव ।
तदपि न हतदैवेनाधुना मे निवासो
नगपतितटमभूमे लभ्यते हन्त हन्त ॥
- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (11)
अनेक जन्म रूप बीथि (गलियों) भें घूमते घूमते अनेक तरह के कष्टों को भोगते हुए अनेक प्रयत्नों से किसी तरह से इस दुर्लभ मानव जन्म को मैंने प्राप्त तो कर लिया किन्तु हा, बड़े खेद का विषय है कि, तथापि दुर्भाग्य वश आज तक भी श्री गिरिराज के निकट-भूमि में निवास करने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ है !
कथमपि मनुजत्वं प्राप्तमप्राप्य मेव ।
तदपि न हतदैवेनाधुना मे निवासो
नगपतितटमभूमे लभ्यते हन्त हन्त ॥
- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (11)
अनेक जन्म रूप बीथि (गलियों) भें घूमते घूमते अनेक तरह के कष्टों को भोगते हुए अनेक प्रयत्नों से किसी तरह से इस दुर्लभ मानव जन्म को मैंने प्राप्त तो कर लिया किन्तु हा, बड़े खेद का विषय है कि, तथापि दुर्भाग्य वश आज तक भी श्री गिरिराज के निकट-भूमि में निवास करने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ है !

