(राग कल्याण व गौरी)
प्रीति तौ एकहिं ठौर भली ।
यह जु कहा मति चरन कमल तजि फिरे जु चली चली ॥[1]
ते जानै जे सब विधि नागर सार सार गहि लोग ।
पायौ स्वाद मधुप रस लोभी स्याम धाम संयोग ॥ [2]
‘परमानंददास' गुन सुंदर नारदादि मुनि ग्यानी ।
सदा विचार विषय रस त्यागी जसु गावत मधु बानी ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (455)
प्रेम तो एक जगह (एक से ही) ही करना चाहिए । यदि यह मन प्रभु के चरण कमलों को त्याग देगा, तो अनायास ही लक्ष्यहीन होकर संसार में भटकेगा । [1]
कुछ ही भाग्यशाली लोग जान पाते हैं कि श्रीकृष्ण ही समस्त सारों के सार हैं और उनके रस के स्वाद को पाकर, वे उनसे ऐसे मोहित हो जाते हैं जैसे एक मधुमक्खी शहद की ओर आकर्षित होती है । [2]
श्री परमानंद दास जी कहते हैं कि नारदजी और मुनि संत आदि ही भगवान के सुंदर गुणों को जानते हैं । अत: वे समस्त विषय वासनाओं को त्याग कर श्री कृष्ण का यशोगान, अपनी मधुर वाणी से करते रहते हैं । [3]
प्रीति तौ एकहिं ठौर भली ।
यह जु कहा मति चरन कमल तजि फिरे जु चली चली ॥[1]
ते जानै जे सब विधि नागर सार सार गहि लोग ।
पायौ स्वाद मधुप रस लोभी स्याम धाम संयोग ॥ [2]
‘परमानंददास' गुन सुंदर नारदादि मुनि ग्यानी ।
सदा विचार विषय रस त्यागी जसु गावत मधु बानी ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (455)
प्रेम तो एक जगह (एक से ही) ही करना चाहिए । यदि यह मन प्रभु के चरण कमलों को त्याग देगा, तो अनायास ही लक्ष्यहीन होकर संसार में भटकेगा । [1]
कुछ ही भाग्यशाली लोग जान पाते हैं कि श्रीकृष्ण ही समस्त सारों के सार हैं और उनके रस के स्वाद को पाकर, वे उनसे ऐसे मोहित हो जाते हैं जैसे एक मधुमक्खी शहद की ओर आकर्षित होती है । [2]
श्री परमानंद दास जी कहते हैं कि नारदजी और मुनि संत आदि ही भगवान के सुंदर गुणों को जानते हैं । अत: वे समस्त विषय वासनाओं को त्याग कर श्री कृष्ण का यशोगान, अपनी मधुर वाणी से करते रहते हैं । [3]

