भजि लै कुंज बिहारिनि बाल ।
अद्भुत रूप रंग रस माती, चितवनि बंक बिसाल ॥ [1]
पाई रंक निसंक अंक धन, करि राखी उर माल ।
श्रीललितकिसोरी लाड लडावत, सहज सनेही ख्याल ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (96)
श्री कुंजबिहारिनी [श्री राधा] का भजन करो जिनका स्वरूप अति अद्भुत है, जो प्रेम रस में सराबोर हैं एवं जिनके विशाल नेत्रों की चितवनी अति बाँकी (तिरछी) है । [1]
उन बिहारिनी जू की यह अगाध कृपा ही है कि उन्होंने मुझे अपने ह्रदय का हार बनाकर, मुझ कंगाल को भी निशंकता से अपना नित्य विहार रस पान कराया है । श्री ललित किशोरी देव जी कहते हैं कि यह तो श्री राधा की कृपा का ही फल है कि अब वे उन्हें सहजता से लाड़ लड़ाते हैं । [2]
अद्भुत रूप रंग रस माती, चितवनि बंक बिसाल ॥ [1]
पाई रंक निसंक अंक धन, करि राखी उर माल ।
श्रीललितकिसोरी लाड लडावत, सहज सनेही ख्याल ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (96)
श्री कुंजबिहारिनी [श्री राधा] का भजन करो जिनका स्वरूप अति अद्भुत है, जो प्रेम रस में सराबोर हैं एवं जिनके विशाल नेत्रों की चितवनी अति बाँकी (तिरछी) है । [1]
उन बिहारिनी जू की यह अगाध कृपा ही है कि उन्होंने मुझे अपने ह्रदय का हार बनाकर, मुझ कंगाल को भी निशंकता से अपना नित्य विहार रस पान कराया है । श्री ललित किशोरी देव जी कहते हैं कि यह तो श्री राधा की कृपा का ही फल है कि अब वे उन्हें सहजता से लाड़ लड़ाते हैं । [2]

