चंद की कलासी, नवलासी सखी संगबारी - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (48)

चंद की कलासी, नवलासी सखी संगबारी - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (48)

(कवित्त)
चंद की कलासी, नवलासी सखी संगबारी,
रंभा, रमा, उमा, 'हठी' उपमा कों को रही? [1]
कीरति किसोरी बृषभान की दुलारी राधा,
आली, वनमाली कौ सहज चित्त चोरही॥ [2]
भौंन ते निकसि प्यारी पाय धारे बाहिर लौं,
लाली तरवान की उमड़ि इक और ही। [3]
बगर-बगर अरु डगर-डगर बर,
जगर-मगर चारों ओर दुति हो रही॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (48)

चन्द्र के समान, नवल सखियों के संग सुसज्जित श्री राधिका की छवि अद्वितीय है । स्वर्ग की अप्सरा रम्भा, लक्ष्मी, पार्वती देवी एवं अन्य ऐसी कौन सी देवी है जिसकी उपमा श्री राधा से की जाए (अर्थात् उनके समक्ष सबकी छवि फीकी दिखती है)। [1]

हे सखी, श्री कीर्ति कुमारी, वृषभानु दुलारी श्री राधिका, जो सुंदर माला को धारण किए हुए है, वे सहज ही मन को मोहित कर लेती हैं। [2]

श्री राधा प्यारी जू, जब अपने भवन से बाहर पग धरती हैं, तो उनके चरणों के तलवों की लालिमा मानो उमड़ के एक ओर से आ जाती है। [3]

श्री हठी जी कहते हैं कि घर-घर एवं गली-गली में, चारों ओर, श्री राधा की जगमग दीप्ति फैल रही है। [4]