(राग कान्हरौ)
मन बावरे तूँ हरि पद अटक्यौ।
अब, तैं साँचौ सुख पायौ तब, दुख लगि घर घर भटक्यौ ॥ [1]
भली करी तैं मोह तोरिकैं, वृंदावन कौं सटक्यौ ।
तें देख्यौ कुंजनिमें मोहन, राधा के उर लटक्यौ ॥ [2]
तेरे वस को, को न विगूच्यौ, जनमत मरत न मटक्यौ ।
व्यास दासह्वै कैं किनि उवरहु, आसा डाइन सब जग गटक्यौ ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (132)
अरे मन बाँवरे, तू अब जाके श्री हरि के चरणों में अटका है, इसी वजह से अब तू साँचा सुख प्राप्त कर रहा है । जब तू संसार में था तो इसी आनंद के लिए घर घर भटकता था और हर जगह केवल दुख ही दुख मिलता था । [1]
तूने बहुत अच्छा किया कि तू इस मोह जंजाल को तोड़कर वृंदावन में आ बसा । वृंदावन में आने से ही तुझे कुंजों में श्री राधा के ह्रदय से लटके हुए श्री कृष्ण के दर्शन हुए हैं (श्री कृष्ण के ऐसे प्रेममय दर्शन किसी और जगह नहीं मिलते ) । [2]
यदि तू वृंदावन न आता तो काल के वशीभूत होकर जन्म मरन के भवसागर में ही सदा सदा को गोते खाता फिरता । श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि इस आशा तृष्णा से तू कैसे छुटकारा पाता, इस आशा रूपी चुड़ैल ने ही तो सारे विश्व को अपनी चपेट में ले रखा है । [3]
मन बावरे तूँ हरि पद अटक्यौ।
अब, तैं साँचौ सुख पायौ तब, दुख लगि घर घर भटक्यौ ॥ [1]
भली करी तैं मोह तोरिकैं, वृंदावन कौं सटक्यौ ।
तें देख्यौ कुंजनिमें मोहन, राधा के उर लटक्यौ ॥ [2]
तेरे वस को, को न विगूच्यौ, जनमत मरत न मटक्यौ ।
व्यास दासह्वै कैं किनि उवरहु, आसा डाइन सब जग गटक्यौ ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (132)
अरे मन बाँवरे, तू अब जाके श्री हरि के चरणों में अटका है, इसी वजह से अब तू साँचा सुख प्राप्त कर रहा है । जब तू संसार में था तो इसी आनंद के लिए घर घर भटकता था और हर जगह केवल दुख ही दुख मिलता था । [1]
तूने बहुत अच्छा किया कि तू इस मोह जंजाल को तोड़कर वृंदावन में आ बसा । वृंदावन में आने से ही तुझे कुंजों में श्री राधा के ह्रदय से लटके हुए श्री कृष्ण के दर्शन हुए हैं (श्री कृष्ण के ऐसे प्रेममय दर्शन किसी और जगह नहीं मिलते ) । [2]
यदि तू वृंदावन न आता तो काल के वशीभूत होकर जन्म मरन के भवसागर में ही सदा सदा को गोते खाता फिरता । श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि इस आशा तृष्णा से तू कैसे छुटकारा पाता, इस आशा रूपी चुड़ैल ने ही तो सारे विश्व को अपनी चपेट में ले रखा है । [3]

