योगिया ध्यान धरैं तिनको  - श्री चरण दास

योगिया ध्यान धरैं तिनको - श्री चरण दास

(सवैया)
योगिया ध्यान धरैं तिनको, तपसी तन गारि के खाक रमावैं। [1]
चारों ही वेद न पावत भेद, बड़े तिरवेदी नहीं गति पावैं॥ [2]
स्वर्ग और मृत्यु पतालहू में, जाको नाम लिये ते सबै सिर नावैं। [3]
‘चरनदास’ तेहि गोपसुता कर, माखन दै दै के नाच नचावैं॥ [4]

- श्री चरणदास

जिनका ध्यान योगीजन सदा करते रहते हैं और जिनको पाने के लिए तपस्वी लोग अपने पूरे शरीर पर भस्म लगाकर कठोर तपस्या करते हैं। [1]

चारों वेद जिनके गुणों का गान करते रहते हैं, परंतु फिर भी उनके रहस्यों का पूरा ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाते। यहां तक कि बड़े-बड़े त्रिवेदी (तीनों वेदों के ज्ञाता) भी उनकी महिमा का पूर्णत: अनुभव नहीं कर सकते। [2]

स्वर्ग, मृत्युलोक, और पाताल में जिनका नाम लेने मात्र से सभी सिर झुका देते हैं। [3]

श्री चरणदास जी कहते हैं कि ऐसे सर्वेश्वर श्री कृष्ण को ब्रज की गोपियाँ माखन दे-देकर नचा रही हैं। [4]