गिरी गोधन पर दोऊ ठाड़े ललित कदम्ब तरै - श्री किशोरीदास (गौड़ीय संत)

गिरी गोधन पर दोऊ ठाड़े ललित कदम्ब तरै - श्री किशोरीदास (गौड़ीय संत)

(राग मेघ मलार, जात्रा ताल)
गिरी गोधन पर दोऊ ठाड़े ललित कदम्ब तरै ।
रस भीजे ब्रजचन्द्र किशोरी घन दामिन से अंक भरै ॥ [1]
उधरयो मेह वरषि तिह छिंन मोर अंग शैलन पर नृत्य करै ।
किशोरीदास वन द्रुम ओरन में कोकिल कुहुकति मनहिं हरै ॥ [2]
- श्री किशोरीदास (गौड़ीय संत)

श्री गिरिराज गोवर्धन पर युगल सरकार श्री राधा कृष्ण सुंदर कदंब वृक्ष के नीचे खड़े हैं । वे रस में ऐसे भीजें हुए हैं मानो घन (मेघ) एवं दामिनी (बिजली) एक दूसरे को आलिंगित किए हुए हो । [1]

तत्पश्चात् मेघ से वर्षा होने लगी, उसी क्षण मोर भी आगये और गोवर्धन पर नृत्य करने लगे । श्री किशोरिदास जी कहते हैं कि वन एवं द्रुम में कोयल भी मधुर स्वर में गान करने लगी जो चित्त का हरण कर रही है  ।  [2]