(कवित्त)
प्रेम के समेत रहो प्रेमियों की संगति में,
प्रेम से नहावो जल यमुना ललाम में। [1]
प्रेम के समेत देखो रास नित्य वंशीवट,
प्रेम के समेत फिरो कुञ्ज वन श्याम में॥ [2]
प्रेम के समेत पावो प्रभु का प्रसाद सदा,
प्रेम के समेत करो प्रीति हरि नाम में। [3]
प्रेम के समेत जपो राधाकृष्ण ! राधाकृष्ण !
प्रेम के समेत बसो वृन्दाबन-धाम में॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (6)
श्री राधा कृष्ण के प्रेमियों की संगती में प्रेम से रहो एवं प्रेम से ही श्री यमुना जल में स्नान करो। [1]
वंशीवट में प्रेम से नित्य रास का दर्शन करो एवं प्रेम से ब्रज के कुञ्जों में विचरण करो। [2]
सदैव प्रेम से ही श्री राधा कृष्ण का प्रसाद ग्रहण करो एवं प्रेम से श्री राधा कृष्ण के नाम में प्रीती करो। [3]
प्रेम से ‘राधाकृष्ण राधा कृष्ण' नाम का जप करो एवं प्रेम से श्री वृन्दावन धाम में वास करो। [4]
प्रेम के समेत रहो प्रेमियों की संगति में,
प्रेम से नहावो जल यमुना ललाम में। [1]
प्रेम के समेत देखो रास नित्य वंशीवट,
प्रेम के समेत फिरो कुञ्ज वन श्याम में॥ [2]
प्रेम के समेत पावो प्रभु का प्रसाद सदा,
प्रेम के समेत करो प्रीति हरि नाम में। [3]
प्रेम के समेत जपो राधाकृष्ण ! राधाकृष्ण !
प्रेम के समेत बसो वृन्दाबन-धाम में॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (6)
श्री राधा कृष्ण के प्रेमियों की संगती में प्रेम से रहो एवं प्रेम से ही श्री यमुना जल में स्नान करो। [1]
वंशीवट में प्रेम से नित्य रास का दर्शन करो एवं प्रेम से ब्रज के कुञ्जों में विचरण करो। [2]
सदैव प्रेम से ही श्री राधा कृष्ण का प्रसाद ग्रहण करो एवं प्रेम से श्री राधा कृष्ण के नाम में प्रीती करो। [3]
प्रेम से ‘राधाकृष्ण राधा कृष्ण' नाम का जप करो एवं प्रेम से श्री वृन्दावन धाम में वास करो। [4]

