सकृदावां प्रपन्नो वा मत्प्रियामेकिकामुत ।
सेवतेनन्यभावेन स मामेति न संशयः ॥
यो मामेव प्रपन्नश्च मत्प्रियां न महेश्वर ।
न कदापि स चाप्नोति मामेवं ते मयोदितम् ॥
- पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 82, छंद (82, 83)
श्री कृष्ण शिव जी से कहते हैं - जो एक बार हम दोनों (मैं और श्री राधा) की शरण में आकर अथवा केवल मेरी प्रिया (श्री राधा) की शरण में आकर उनकी अनन्य भाव से सेवा करता है, वह निस्संदेह मुझको प्राप्त होता है । महेश्वर! इसके विपरीत जो मेरी शरण में आगया, परंतु मेरी प्रिया की शरण में नहीं आया, वह मुझको कभी भी प्राप्त नहीं होगा ।
सेवतेनन्यभावेन स मामेति न संशयः ॥
यो मामेव प्रपन्नश्च मत्प्रियां न महेश्वर ।
न कदापि स चाप्नोति मामेवं ते मयोदितम् ॥
- पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 82, छंद (82, 83)
श्री कृष्ण शिव जी से कहते हैं - जो एक बार हम दोनों (मैं और श्री राधा) की शरण में आकर अथवा केवल मेरी प्रिया (श्री राधा) की शरण में आकर उनकी अनन्य भाव से सेवा करता है, वह निस्संदेह मुझको प्राप्त होता है । महेश्वर! इसके विपरीत जो मेरी शरण में आगया, परंतु मेरी प्रिया की शरण में नहीं आया, वह मुझको कभी भी प्राप्त नहीं होगा ।

