तुम बिन कासौं विनय कहौं।
श्यामा प्यारी सुनौ वीनती; कहां लग विरह सहौं॥ [1]
ऐसो को समरथ जग माहीं जाकी शरन लहौं।
सुन्दर श्याम सिरोमन कहै मुख राधे चरन गहौं॥ [2]
इन विन और न कोई दीषत जाकी बांह रहौं ।
अली माधुरी को अपनावो और न कछु चहौं॥ [3]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका (2)
हे श्री राधे, आपके अतिरिक्त मैं किससे विनती करूँ? हे श्यामा प्यारी, मेरी विनती सुनिये या फिर मुझे बता दीजिए कि मैं कब तक तुम्हारे विरह ताप को सहन करता रहूँ । [1]
संसार में आपके अतिरिक्त ऐसा कौन समर्थ (एवं कृपालु) है, जिसकी शरण में मैं जाऊं । श्री श्यामसुंदर स्वयं अपने मुख से आपके श्रीचरणों की ही शरण ग्रहण करने को कहते हैं । [2]
आपके बिना मुझे और कोई ऐसा दिखता ही नहीं जो मेरी बाँह को पकड़े (अर्थात् मुझे शरण दे) । श्री अली माधुरी जी कहते हैं "हे श्री राधे, मुझे कैसे भी आप अपना लो, और मुझे कुछ नहीं चाहिए।" [3]
श्यामा प्यारी सुनौ वीनती; कहां लग विरह सहौं॥ [1]
ऐसो को समरथ जग माहीं जाकी शरन लहौं।
सुन्दर श्याम सिरोमन कहै मुख राधे चरन गहौं॥ [2]
इन विन और न कोई दीषत जाकी बांह रहौं ।
अली माधुरी को अपनावो और न कछु चहौं॥ [3]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका (2)
हे श्री राधे, आपके अतिरिक्त मैं किससे विनती करूँ? हे श्यामा प्यारी, मेरी विनती सुनिये या फिर मुझे बता दीजिए कि मैं कब तक तुम्हारे विरह ताप को सहन करता रहूँ । [1]
संसार में आपके अतिरिक्त ऐसा कौन समर्थ (एवं कृपालु) है, जिसकी शरण में मैं जाऊं । श्री श्यामसुंदर स्वयं अपने मुख से आपके श्रीचरणों की ही शरण ग्रहण करने को कहते हैं । [2]
आपके बिना मुझे और कोई ऐसा दिखता ही नहीं जो मेरी बाँह को पकड़े (अर्थात् मुझे शरण दे) । श्री अली माधुरी जी कहते हैं "हे श्री राधे, मुझे कैसे भी आप अपना लो, और मुझे कुछ नहीं चाहिए।" [3]

