माधुरी की रास सब शोभा को निवास जहां - श्री माधुरी दास जी, वंशीवट माधुरी (271)

माधुरी की रास सब शोभा को निवास जहां - श्री माधुरी दास जी, वंशीवट माधुरी (271)

(कवित्त)
माधुरी की रास सब शोभा को निवास जहां,
खेलत रसीले रास मंडल वलित री। [1]
नूपुर कंकन कंठमाल कंठ शोभित है,
किंकनी सुकटि कलि कूंजति ललित री॥ [2]
भृकुटी विलास मृदु पद न्यास नृत्य लास,
वदन विकास कोटि मदन दलित री। [3]
मुरली की धुनि मंद मंद गति बाजति है,
ताके अनुसार चारु लोचन चलित री॥ [4]

- श्री माधुरी दास जी, वंशीवट माधुरी (271)

रस से भरे श्री श्यामा श्याम, वंशीवट में स्थित रास मण्डल में मधुर रास नृत्य कर रहे हैं, जहाँ समस्त शोभा का निवास है। [1]

उनके चरणों में नूपुर, हस्त कमलों में कंगन एवं कंठ में पुष्पों की माला सुशोभित है। कमर में किंकिणी शोभायमान है, जिसकी झंकार से मधुर धुन प्रकट हो रही है। [2]

युगल किशोर की भृकुटि चलायमान है, उनके कोमल चरण सुन्दर नृत्य की गति ले रहे हैं। उनके वदन के नवनवायमान माधुरी से कोटि-कोटि कामदेव दलित हो रहे हैं, अर्थात कामदेव के अहंकार का मर्दन हो रहा है। [3]

मंद गति से वंशी की धुन बज रही है, जिसकी ताल के अनुसार ही श्री श्यामा श्याम के नेत्र भी चलायमान हैं। [4]