रसिक जननी के संग सों न्यारो कभू न होय।
जो एकांत चित में रुचै तऊ घरी भरी दोय ॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (83)
जीव को हर स्थिति में रसिक संतों का संग सदा करते रहना चाहिए क्योंकि जो एकांत साधना से जीव के ह्रदय में भाव आता है वह रसिकों के संग से एक क्षण में आ जाता है ।
जो एकांत चित में रुचै तऊ घरी भरी दोय ॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (83)
जीव को हर स्थिति में रसिक संतों का संग सदा करते रहना चाहिए क्योंकि जो एकांत साधना से जीव के ह्रदय में भाव आता है वह रसिकों के संग से एक क्षण में आ जाता है ।

