(सवैया)
यह बाग लली ललितेश का है, रितुराज ने साज सजाया इसे। [1]
शशि ने अभिराम ये घेरा रचा, रति ने कर से है सिंचाया इसे॥ [2]
हैं अनंग ने फूल लगाये सभी, लक्ष्मी निज वास बनाया इसे। [3]
बिना लाड़िली की जय बोले हुये, रसराज ना पाया किसीने इसे॥ [4]
- ब्रज के सवैया
यह बाग़ लाड़िली श्री राधा एवं ललितेश श्री कृष्ण का है, जो सदैव बसंत ऋतु से आच्छादित रहता है। [1]
चंद्र ने इस बाग़ का घेरा बनाया है एवं रति देवी ने इसे सींचा है। [2]
कामदेव ने स्वयं इस बाग़ में फूल लगाए हैं एवं लक्ष्मी जी ने इसे निजवास बनाने का प्रयत्न किया है। [3]
श्री राधा की जय बोले बिना श्री वृन्दावन रुपी इस परम रसराज को आजतक किसी ने प्राप्त नहीं किया। [4]
यह बाग लली ललितेश का है, रितुराज ने साज सजाया इसे। [1]
शशि ने अभिराम ये घेरा रचा, रति ने कर से है सिंचाया इसे॥ [2]
हैं अनंग ने फूल लगाये सभी, लक्ष्मी निज वास बनाया इसे। [3]
बिना लाड़िली की जय बोले हुये, रसराज ना पाया किसीने इसे॥ [4]
- ब्रज के सवैया
यह बाग़ लाड़िली श्री राधा एवं ललितेश श्री कृष्ण का है, जो सदैव बसंत ऋतु से आच्छादित रहता है। [1]
चंद्र ने इस बाग़ का घेरा बनाया है एवं रति देवी ने इसे सींचा है। [2]
कामदेव ने स्वयं इस बाग़ में फूल लगाए हैं एवं लक्ष्मी जी ने इसे निजवास बनाने का प्रयत्न किया है। [3]
श्री राधा की जय बोले बिना श्री वृन्दावन रुपी इस परम रसराज को आजतक किसी ने प्राप्त नहीं किया। [4]

