अहो धनि श्रीवृन्दावन धाम।
जहाँ समाज रहत संतन को गावत हरि कौं नाम॥ [1]
निसिदिन जहाँ निकुंजनि-कुंजनि बिहरत स्यामा स्याम।
जहाँ बिहारी निज जन 'केशव' पूजत मन के काम॥ [2]
- श्री केशव देव जी
अहो, श्री वृन्दावन धाम धन्य है, जहाँ संतों का समाज रहता है जो नित्य श्री हरि के नाम का उच्चारण करते रहते हैं। [1]
श्री केशव देव कहते हैं कि "जहाँ श्री श्यामाश्याम निशिदिन कुंज और निकुंजों में विहरण करते हैं, ऐसे वृन्दावन धाम में श्री बाँकेबिहारी कृपापूर्वक अपने भक्तों की मन की इच्छाएँ पूर्ण करते हैं।" [2]
जहाँ समाज रहत संतन को गावत हरि कौं नाम॥ [1]
निसिदिन जहाँ निकुंजनि-कुंजनि बिहरत स्यामा स्याम।
जहाँ बिहारी निज जन 'केशव' पूजत मन के काम॥ [2]
- श्री केशव देव जी
अहो, श्री वृन्दावन धाम धन्य है, जहाँ संतों का समाज रहता है जो नित्य श्री हरि के नाम का उच्चारण करते रहते हैं। [1]
श्री केशव देव कहते हैं कि "जहाँ श्री श्यामाश्याम निशिदिन कुंज और निकुंजों में विहरण करते हैं, ऐसे वृन्दावन धाम में श्री बाँकेबिहारी कृपापूर्वक अपने भक्तों की मन की इच्छाएँ पूर्ण करते हैं।" [2]

