यह रस दुर्लभ जग में जानौं - श्री हित रूप लाल

यह रस दुर्लभ जग में जानौं - श्री हित रूप लाल

यह रस दुर्लभ जग में जानौं।
नित्य विहार केलि वृन्दावन प्रीति रीति पहिचानौं॥ [1]
निगमागम शिव विधि सनकादिक परम तत्त्व उर आनौं।
(जै श्री) रूपलाल हित रसिक उपासक प्रेमी प्रेम बखानौं॥ [2]
- श्री हित रूप लाल

संसार में इस रस को दुर्लभ ही समझो। वृन्दावन में घटित होनेवाली इस 'नित्य विहार' की केली लीलाओं के रस के इस सुक्ष मार्ग को प्रीति की रीति से पहचानो। [1]

आगम, निगम, शिव, ब्रह्मा, सनकादि से परे इस परम रस को अपने ह्रदय में धारण करो। श्री हित रूपलाल जी कहते हैं, रसिक भक्तों ने इस अत्यंत दुर्लभ रस एवं श्री श्यामाश्याम का अपनी वाणी में प्रकाश एवं बखान किया है। [2]