करिये ब्रज बासिन सौं नेह ।
नख सिख भरे प्रीत रस सागर आवत कबहुँ न छेह॥ [1]
नन्दनन्दन प्यारे के प्यारे नित मतवारे रूप।
नागरीदास मिलावत मोहन रसिक कुंवर व्रज भूप॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (3)
ब्रज वासियों से प्रेम बढ़ाइए क्योंकि ब्रजवासी नख से सिख तक (संपूर्ण रूप से) प्रेम के सागर से ओतप्रोत रहते हैं जिनमें कभी भी प्रेम का खंडन नहीं होता। [1]
ब्रजवासीगण प्यारे नन्दनन्दन श्री कृष्ण के प्यारे हैं, जो सदैव प्रेम में मतवारे रहते हैं। श्री नागरीदास जी कहते हैं कि "ये ब्रजवासी हमे ब्रजराज रसिक कुंवर मनमोहन श्री कृष्ण से मिलाने वाले हैं।" [2]
नख सिख भरे प्रीत रस सागर आवत कबहुँ न छेह॥ [1]
नन्दनन्दन प्यारे के प्यारे नित मतवारे रूप।
नागरीदास मिलावत मोहन रसिक कुंवर व्रज भूप॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (3)
ब्रज वासियों से प्रेम बढ़ाइए क्योंकि ब्रजवासी नख से सिख तक (संपूर्ण रूप से) प्रेम के सागर से ओतप्रोत रहते हैं जिनमें कभी भी प्रेम का खंडन नहीं होता। [1]
ब्रजवासीगण प्यारे नन्दनन्दन श्री कृष्ण के प्यारे हैं, जो सदैव प्रेम में मतवारे रहते हैं। श्री नागरीदास जी कहते हैं कि "ये ब्रजवासी हमे ब्रजराज रसिक कुंवर मनमोहन श्री कृष्ण से मिलाने वाले हैं।" [2]

